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डिफरेंशियेबलिटी और उसके सिद्धांत
Sep 20, 2024
डिफरेंशियेबलिटी पर व्याख्यान
परिचय
आज का विषय: डिफरेंश ियेबलिटी
पिछली वीडियो में कंटिनूटी पर चर्चा की गई थी।
डिफरेंशियेबलिटी क्या है?
एक फंक्शन तब डिफरेंशियेबल होता है जब उसका डेरिवेटिव उस विशेष बिंदु पर मौजूद हो।
डेरिवेटिव का होना जरूरी है ताकि हम कह सकें कि फंक्शन उस बिंदु पर डिफरेंशियेबल है।
डेरिवेटिव का गणितीय निरूपण
पॉइंट A पर डेरिवेटिव निकालने का तरीका:
एफ डैश ऑफ ए = लिमिट (एच → 0) [(एफ ऑफ ए प्लस एच - एफ ऑफ ए) / एच]
यहाँ, ए और ए + एच के बीच की दूरी बहुत कम होती है क्यूंकि एच 0 के करीब होता है।
दृष्टिगत प्रस्तुति
एफ ऑफ एक्स का ग्राफ:
पॉइंट A पर एफ ऑफ ए की वैल्यू।
अगला पॉइंट ए + एच, जहाँ उसकी वैल्यू एफ ऑफ ए प्लस एच होगी।
टेंजेंट और उसका ढलान
टेंजेंट का ढलान निकालने के लिए:
ढलान = डेल्टा वाई / डेल्टा एक्स
डेल्टा वाई = एफ ऑफ ए प्लस एच - एफ ऑफ ए
डेल्टा एक्स = ए + एच - ए = एच
महत्वपूर्ण बिंदु
अगर कोई फंक्शन डिफरेंशियेबल है, तो उसका टेंजेंट उस बिंदु पर बनाया जा सकता है।
यदि डिफरेंशिएबल है, तो यह निरंतर भी होना चाहिए।
यदि कोई फंक्शन उस बिंदु पर नॉन-डिफरेंशियेबल है, तो आप वहाँ टेंजेंट नहीं खींच सकते।
निष् कर्ष
डिफरेंशिएबलिटी और कंटिन्यूटी के बीच का संबंध समझना महत्वपूर्ण है।
कुछ न्यूमेरिकल उदाहरणों के माध्यम से इसका और अधिक स्पष्टता से अध्ययन किया जाएगा।
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